कैसे संघर्ष और परिस्थितियों के बीच सिंगल मदर दीपिका बनी जिम संचालिका – दीपिका ओझा

संसार में हर माँ का अपने बच्चों के लिए संघर्ष होता है, पर सिंगल मदर होकर बच्चों की परवरिश करना बहुत मुश्किल हो जाता है, ऐसे वक्त में जब बच्चें बहुत छोटे हो, और माँ को अपनी नौकरी के साथ ही बच्चों की सभी जिम्मेदारियाँ भी निभाना हो।

हम बात कर रहे हैं, राजस्थान भीलवाड़ा निवासी दीपिका ओझा जी की, जिन्होंने सिंगल मदर से लेकर स्वयं के जिम संचालन तक का एक बहुत मुश्किल सफर तय किया है। 

दीपिका जी का जन्म भीलवाड़ा में ही 25 सितंबर सन् 1985 को हुआ।

सामान्य से परिवार में इनकी परवरिश हुई। जब ये छोटी थी तब इनके पिताजी का देहांत हो गया था, तो इनकी माताजी नें प्रायवेट नौकरी कर इनका पालन पोषण किया। सामान्य हालातों के बीच ही इनका बचपन व्यतीत हुआ ।

सरकारी स्कूल से इन्होंने शिक्षा प्राप्त की, ये पढ़ाई में काफी होशियार रही। 

स्कूली शिक्षा समाप्त होने के बाद इन्होंने,सरकारी काॅलेज से पढ़ाई प्रारम्भ की। और डिग्री खत्म होते-होते सन् 2008 में इनकी शादी हो चुकी थी। 

शादी के बाद ये अपनी पढ़ाई जारी नहीं कर पाई, इनका सपना उच्च शिक्षा को प्राप्त करने का था। परन्तु शादी के बाद पारिवारिक व्यस्तताओं के चलते इन्हें अपनी पढ़ाई बंद करनी पड़ी। और घर गृहस्थी की जिम्मेदारीयों के बीच उलझ कर रह गई। सन् 2012 तक ये दो बेटियों की माँ बन चुकी थी। 

उस समय तक इनकी शादीशुदा जिंदगीं में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव आने लगे थे, बहुत ज्यादा परेशानी रहने लगी तब इन्होंने गहन विचार कर अपने पति से अलग होने का मन बना लिया, ओर कानूनन रुप से बच्चियों की जिम्मेदारी स्वयं ले ली। इन्होंने अपने परिवार पर निर्भर होने की अपेक्षा स्वंय आत्मनिर्भर हो कर

अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया, इतना बड़ा जिम्मा अकेले ले कर चलना किसी के लिए भी सोचना बहुत कठिन होता है। 

जब इनका, इनके पति से अलगाव हुआ, उस वक्त इनकी बड़ी बेटी की उम्र 6 वर्ष और छोटी बेटी की उम्र 3 वर्ष की थी। 

इतने छोटे बच्चों की अकेले देखभाल करना, बिना किसी सहारे के मुश्किल होता है, बच्चों को माँ के साथ पिता का भी प्यार देना। अब माँ, पिता दोनों की जिम्मेदारी स्वयं निभाने की बारी थी।

इस जिम्मेदारी निभाने के शुरूआती  दौर में कई जगह नौकरी भी की, प्रायवेट कम्पनी, प्रायवेट स्कूल में ऐसी बहुत सी नौकरियां की, परन्तु जब ये सुबह से लेकर शाम तक नौकरी पर रहती, तब इतने छोटे बच्चों को घर पर अकेला छोड़ कर जाना संभव नहीं हो पा रहा था, क्योंकि उस समय इनके बच्चे इतने छोटे थे, कि अपना कुछ भी काम खुद से नहीं कर पाते थे।

उस समय किराये का मकान था, नौकरी में समस्या चल ही रही थी। साथ ही बच्चों की फीस और घर खर्च सबकुछ देखकर चलना होता था।

इन्होंने खुद कितनी भी तकलीफ़ें देखी पर बच्चों के भविष्य के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया।

उस समय इनकी सुबह से लेकर शाम तक नौकरी के चलते बच्चों को इन्होंने डे-बोर्ड होस्टल में रखा, ताकि बच्चें स्कूल से सीधा होस्टल चलें जाएं, और जब ये नौकरी से छूटे, तो बच्चों को लेकर घर आ जाएं।

क्योंकि इतने छोटे बच्चों को घर पर अकेला छोड़ना सुरक्षित नहीं होता है।

इसलिए इन्होंने डे-बोर्ड होस्टल को चुनना ज्यादा बेहतर समझा।

वक्त ऐसे ही गुजरा रहा था, नौकरी भी ठीक-ठीक चल रही थी, पर नौकरी के चलते बच्चों को ज्यादा समय नहीं दे पा रही थी, बच्चें भी होस्टल में परेशान होते थे।

इस परेशानी को देखते हुए इन्होंने कुछ ऐसा करने का सोचा जिससे इनकी आय का स्त्रोत भी बढ़े और अपने बच्चों को भी अधिक से अधिक समय दे पाए।

फिर एक परिचित ने बताया कि, यदि आप जिम में नौकरी करती है, जिम ट्रेनर बनती है, तब आप बच्चों के साथ अधिक समय व्यतीत कर पाएंगी। 

क्योंकि जिम में सुबह और शाम के समय ही लोग जिम करने आते हैं।

परन्तु दीपिका के परिवार वाले चाहते थे, कि ये कहीं स्कूल में नौकरी कर ले या घर पर ही कोचिंग पढ़ाना शुरु कर दे। पर तब तक दीपिका की सोच कहीं ओर निर्धारित हो चुकी थी, ये अपने फैसले पर अडिग रही और इन्होंने  जिम में ट्रेनर की नौकरी करने का मन बना लिया, ओर ये नौकरी करने लगी।

अब उस समय सबसे बड़ी मुश्किल सामने ये रही कि, इन्होंने जिम ट्रेनर के रुप में जब ट्रेनिंग लेना शुरू की, तब इन्हें इस क्षेत्र की कोई भी जानकारी नहीं थी। शुरुआत से सबकुछ शुरू करना बहुत मुश्किल रहा, पर इन्होंने हिम्मत से काम लिया।

जब ये ट्रेनर के लिए ट्रेनिंग ले रही थी, उस समय सब सीख ही रही थी, तब इन्हें सैलरी नहीं मिलती थी, लगभग 6 महीनों तक इन्होंने अपनी जिंदगी के सबसे कठिन दिन देखे, अपनी बचत से ही घर खर्च, बच्चों की फीस, किराये की सबकुछ व्यवस्था करना थी। उस समय बस इनकी अति आवश्यक जरुरतें ही पूरी हो पा रही थी। 

जब ये सम्पूर्ण रुप से ट्रेनिंग को पूरा कर चुकी थी, तब इनकी सैलरी शुरु हुई, और आय के साथ ही परिस्थितियों में अच्छा परिवर्तन आने लगा।

लगातार सन् 2014 से सन् 2019 तक इन्होंने जिम ट्रेनर की भूमिका और सिंगल मदर होने की, दोनों जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया। दोनों के बीच संतुलन बनाए रखा, साथ ही बच्चों को अच्छे संस्कार दे रही है। बच्चों की शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दे रही है।

लगभग 5 सालों तक जिम ट्रेनर के रुप में सफल होने के बाद इन्होंने एक रिस्क लिया, खुद का जिम शुरु करने का सोचा ओर फिर दिनांक 1 जनवरी 2020 को भीलवाड़ा शहर में अपनी मेहनत से स्वंय के जिम की नींव रखी ओर सफलतापूर्वक अब जिम का संचालन भी कर रही है।

अटूट मेहनत के बाद अब आर्थिक सम्पन्नता के साथ अपने परिवार के साथ जीवनयापन कर रही है। 

दीपिका कहती है, कि जिस समय वे कठिन परिस्थितियों से गुजर रही थी, तब उनके दोस्तों ने उनका साथ दिया, विश्वास दिलाया, उनके साथ मजबूती से खड़े रहे। 

ये कहती हैं कि यदि बुरा वक्त नहीं आएगा तो अच्छे वक्त की कद्र कोई नहीं करेगा, जीवन में संघर्ष भी होना चाहिए।

जिस संघर्षों से ये गुजरी है, इनके बच्चों ने वो देखा ओर समझा है।

दीपिका अपने बच्चों के सभी सपने सच करना चाहती हैं। 

ये जानवरों ओर कुत्तों की सेवा करने में बहुत विश्वास करती है, जो बोल नहीं सकते अपनी परेशानी किसी को बता नहीं सकते, ऐसे जीवों के लिए, भोजन, दवाई, इलाज की व्यवस्था करती है। और भविष्य में इनके लिए एक डॉग होस्टल शुरु करना चाहती है।

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