कोटा की बेकरी में काम करने वाले प्रकाश कैसे पहुँचे दुबई की सबसे बड़ी कम्पनी में – प्रकाश मूलचंदानी

अक्सर, मजबूरी जो काम करा लेती है, उनका सोचा जाना भी मुश्किल होता है। समय कभी इतना मुश्किल आ जाता है, कि उसका सामना करना कठिन हो जाता है। 

आज हम बात करेंगें 

एक ऐसे शख्सियत की, जो दुबई टेलीकॉम एमिरेट्स इंटीग्रेटेड टेलीकम्युनिकेशन्स कंपनी  (DU) का एक जाना-पहचाना नाम है।

जिनका सफर कोटा की छोटी-छोटी बेकरी और दुकानों पर काम करने से लेकर DU में प्रोजेक्ट मैनेजर तक का रहा है।

हम बात कर रहे हैं, श्री प्रकाश मूलचंदानी जी की जिनका जन्म कोटा राजस्थान में 13 फरवरी सन् 1982 को हुआ, इनके पिताजी बहुत छोटे व्यापारी रहे,पारिवारिक स्थिती बेहद नाजुक रही, और कुछ कुछ समय बाद लगभग सन् 1992 आते-आते इनके पिताजी को व्यापार में बहुत बड़ा घाटा हुआ हालात और ज्यादा खराब हो गए। 

तब घर की स्थिति को देखकर प्रकाश ने स्कूल जाने के साथ ही लगभग 13 वर्ष की उम्र में वहीं कोटा की एक बेकरी में हेल्पर की नौकरी शुरु कर दी, जिसमें टेबल साफ करने से लेकर सभी काम किया करते थे।

कुछ समय बाद दुसरी दुकान पर काम करने लगे, बाद में एक जूते चप्पल की दुकान पर काम करना शुरु किया और लगभग तीन साल तक वहांँ लगातार काम किया, जिसमें इनका स्कूल और नौकरी साथ चलती रही।

स्कूल से आ कर सीधे नौकरी पर चले जाते थे, जो तनख्वाह आती थी, उससे परिवार में कुछ मदद हुआ करती थी। 

उस वक्त पिताजी भी कुछ ना कुछ व्यापार करने लगे थे, पर व्यापार में सफल नहीं रहे, वो दौर बहुत नाजुक था। 

सन् 2004 तक लगातार दुकान पर काम जारी रखा, साथ अपने स्कूल की पढ़ाई को भी जारी रखा , पढ़ाई में इतने अच्छे तो नहीं थे, कभी पास तो कभी फेल भी हो जाते थे।

उस वक्त हालात इतने खराब रहे, कि जब इनकी बहनों की शादी का समय आया, इन्होंने अपने बड़े घर को बेचकर बहनों की शादी की और ये एक बहुत छोटे से घर में रहने लगे।

सन् 2004 खत्म होते वक्त तक कोटा के सरकारी काॅलेज से प्रकाश ग्रेजुएट हो गए थे, और कम्प्यूटर का कोर्स करने लगे, फिर एक प्रायवेट स्कूल में नौकरी करने लगे।

प्रकाश कुछ समय बाद किसी काम से कोटा से इंदौर आए, तो पता लगा कि यहाँ मुंबई के एक काॅल सेंटर के लिए भर्ती निकली है। 

कहते हैं, ना कि बुरा वक्त हो तो कुछ भी हो जाता है, यहाँ प्रकाश के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, इंटरव्यू देने जाते वक्त दुर्घटना हो गई, जिसमें इन्हें चोट आई, और प्रकाश नें उसी स्थिती में इंटरव्यू दिया और नौकरी लग गई। 

अब समय आ गया था, मुंबई जाने का

पर घर की स्थिती तो वैसे ही खराब थी, तो बहुत कम पैसे लेकर मुंबई के लिए निकल गए, मुंबई जाते समय इनके साथ कुछ धोखाधड़ी हुई और जो पैसे थे, वो भी चले गए।

फिर मुंबई जाकर नौकरी करने लगे, पैसे तो थे, नहीं तब उस समय रेल्वे स्टेशन पर सो जाया करते थे, और कुछ भी खा कर दिन निकाल लिया करते थे। 

नौकरी पर ज्यादा ओवरटाईम करते थे, कभी-कभी 20 घंटे से 22 घंटे तक लगातार नौकरी करते थे, डबल शिफ्ट में अक्सर काम किया करते थे, क्योंकि खुद के खर्च के साथ घर पर भी पैसे भेजना होते थे। 

वो बहुत मुश्किल का दौर रहा, वो कभी भूखे भी रहे तो कभी कम खा कर भी गुजारा कर लिया करते थे। 

कुछ महीनों बाद एक छोटा सा घर किराये पर ले लिया और डबल शिफ्ट में नौकरी जारी रखी। 

कभी तो लोकल ट्रेन छूट जाने की वजह से और पैसा बचाने के उद्देश्य से कई किलोमीटर पैदल चलकर नौकरी पर जाते थे। 

कुछ समय बाद एक दुसरी कम्पनी में इंटरव्यू दिया और ज्यादा सैलरी पर वहाँ नौकरी कर ली, जिससे इनके रहने खाने की दिक्कत थोड़ी कम होने लगी, और घर पर मदद थोड़ी ज्यादा होने लगी। फिर कुछ साल वहांँ नौकरी लगातार की। 

कुछ समय बाद इनके दोस्त की मदद से दुबई में नौकरी करने का मौका मिला और प्रकाश दुबई की और चल दिए, दुबई में भी स्थिति ठीक तो नहीं थी, वहां एक छोटे घर में 8 से 10 लोग साथ रहा करते थे। 

परदेस में सबकुछ संभालना मुश्किल था, पर हिम्मत नहीं हारी और फिर एक काॅलसेंटर में नौकरी करने लगे, और बचत कर करके घर पर पैसे भेजने लगे, और परिवार की स्थिती में अब थोड़ा सा बदलाव आने लगा था। 

ओवरटाइम लगातार करते रहे,वहाँ भी कभी 20 घंटे तो कभी 22 घंटे काम करते थे, ताकि तनख्वाह ज्यादा बने। 

और घर पर ज्यादा पैसे भेज सके। 

अब तक घर के हालातों में धीरे-धीरे कुछ सकारात्मक परिवर्तन होने लगे थे। 

वक्त बदलने का मौका सबको मिलता है, ऐसा ही कुछ प्रकाश के साथ हो रहा था, कि वो दुबई की एक कम्पनी में इंटरव्यू देने गए जहांँ जगह खाली थी, पर आईटी वालों के लिए ही। 

पर किस्मत से ये नौकरी प्रकाश को मिल गई। 

जब इन्होंने यह नौकरी शुरू की तब इन्हें आईटी की इतनी कुछ जानकारी नहीं थी। वहाँ कुछ समय इन्हें काम सीखाया गया और फिर प्रकाश नौकरी से घर आ कर आईटी के साॅफ्टवेयर सीखते, इंटरनेट की मदद से काम सीखते रहे  प्रेक्टिस करते रहे और काम करते रहे। 

कुछ समय बाद ये अन्य कम्पनी में आ गए, धीरे-धीरे छोटे और बड़े प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने का मौका मिलने लगा, और इसमें ये सफल भी रहे।

आज प्रकाश दुबई की टेलीकॉम कंपनी     

एमिरेट्स इंटीग्रेटेड टेलीकम्युनिकेशन्स कंपनी(DU) में एक सफल पद पर अब वे प्रोजेक्ट मेनेजर बन कर काम कर रहे हैं।

अब इनकी मेहनत और लगन से काम करने की वजह से इनका परिवार आज सम्पन्न स्थिती में आ गया है। और आज छोटे घर की बजाय एक अच्छे घर में रह रहे हैं, और अच्छा जीवनयापन करने लगे हैं। 

जब बुरा समय था, तब प्रकाश सोचते थे,कि जो आज स्थिति है, भविष्य में उससे भी बेहतर दिन जरुर आएगें

आज जो वो बचत कर रहे हैं, वो जल्दी ही बढ़ेगी और वक्त के साथ सब सही होगा। 

इन्होंने जो बचपन से स्थिति देखी है, अपने माँ – पापा को जो हालातों में देखा है, जो संघर्ष देखा है, जिस तरह से इनका बचपन बीता है, वही इन्हें ज्यादा से ज्यादा मेहनत और हिम्मत ना हारने का जज़्बात देती है। 

प्रकाश कहते हैं, कि संघर्षों का दौर कभी ना कभी तो खत्म होता ही है। बस सबकुछ सही होता देखने के लिए लगन और ईमानदारी की जरूरत होती है। 

वक्त जैसा भी हो, बचत करना जरुरी होता है, चाहे वो बचत छोटी हो या बड़ी भविष्य में यह काम अवश्य देती है। 

और यह हुआ, और आज वक्त भी बेहतर है, और हालात भी।

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