नौकरी छोड़ प्रतिभा ने कैसे दिया उज्जैन शहर को प्रतिभाओं का उपहार – प्रतिभा रघुवंशी एलची

छोटे शहर के युवा जिनकी सोच

देश-विदेश में जाकर बड़ी से बड़ी कम्पनी में नौकरी करने की होती है, वहीं कुछ ऐसी प्रतिभाएं होती है,जो अपने शहर के लिए कुछ करने के सपने बुनने लगते हैं, और उन्हें पूरा करने की जद्दोजहद में लग जाते हैं। 

हम बात कर रहे हैं, श्रीमती इंजी. प्रतिभा रघुवंशी एलची जी की जिनका जन्म 3 मार्च सन् 1991 को उज्जैन में हुआ। 

संगीत और नृत्य तो जैसे इन्हें विरासत में आशीर्वाद के रुप में प्राप्त हुआ है। जहांँ इनके पिताजी रिदम, गायन, तबला ढोलक, ड्रम, सीखते और बजाते थे। 

तो इन्हें बचपन से ही संगीत का माहौल मिला, और इनकी माताजी एक क्लासिकल नृत्यांगना के साथ शिक्षिका भी रही। तो इन्हें बचपन से ही कला के साथ पढ़ाई का एक मिलाजुला माहौल मिला है। जिसमें शिक्षा के साथ-साथ अन्य विधाओं की जानकारियाँ भी मिलती रही। जिसमें संगीत, कथक, रंगमंच आदि शामिल हैं। 

जब बच्चे ठीक से बोलना भी नहीं सीखते, तब उस ढाई साल की उम्र में प्रतिभा नें कथक सीखना शुरु कर दिया था। और तीन साल की उम्र में नृत्यांगना और अदाकारा श्रीदेवी जी के सामने अपनी पहली प्रस्तुति दी।

जैसे सभी बच्चों की पहली गुरु उनकी माँ होती है, वैसे ही इनकी पहली नृत्य गुरु इनकी माताजी ही रही। 

प्रतिभा को बढ़ती उम्र के साथ जितना पढ़ाई पर ध्यान देना जरुरी था, उतना ही अपने सपने अपने नृत्य के लिए भी समय देना जरुरी था।

अब रोज़ाना स्कूल जाना, पढ़ाई करना, और उसके बाद भी रोज लगभग 3 से 5 घंटे प्रतिदिन अभ्यास करना यह उनका नित्य नियम बन चुका था। 

प्रतिभा को बेहद मुश्किल लगता था। 

छोटी उम्र, पढ़ाई और लगातार मंच पर होने वाली प्रस्तुति के लिए तैयार रहना। पर उनका नृत्य के प्रति समर्पण और दृढ़निश्चय से इन्होंने दोनों के बीच हमेशा सही तालमेल बनाएं रखा।

कई बार तो ऐसी भी स्थिति आई, जहाँ शाम को मंच पर प्रस्तुति देना है, और अगली ही सुबह परीक्षा में भी जाना होता था। उस स्थिती में भी पर्दे के पीछे भी पढ़ाई करती रहती थी, ताकि परीक्षा परिणाम अच्छा रहे। 

जिस तरह छोटी ही उम्र में प्रतिभा नें मंच संभाल लिया था, उसी तरह कम उम्र में शहर और प्रदेश के लिए यह एक उभरती हुई नृत्यांगना के रुप में ख्याति प्राप्त करने लगी थी।

प्रतिभा नृत्य में देश के सबसे पुराने घराने जयपुर घराने से जुड़ी है। इन्होनें कथक तो अलग-अलग गुरुओं से सीखा है, पर विशेष रूप से अपनी माताजी, और फिर प. राजेंद्र गंगानी जी से सीखा, गंगानी जी जिनका कथक विश्वप्रसिद्ध है, जो जयपुर घराने के वर्तमान में मुख्य गुरु है।

लगभग अब प्रतिभा अपने स्कूल, कथक और मंच का तालमेल बेहतर रुप से करने लगी थी, जिनके लिए इन्होंने बहुत मेहनत की यहां तक इनका सामंजस्य, तालमेल को लेकर संघर्ष रहा।

दसवीं कक्षा के बाद जब प्रतिभा ने आगे जा कर इंजीनियरिंग करने का मन बना लिया। उस दौरान एक बार फिर स्थिति के साथ लड़ने और संघर्ष और फिर वहीं तालमेल बैठाने का दौर था। अब जिस हिसाब से पढ़ाई का दबाव बनने लगा था, वहीं अभ्यास को भी अधिक समय देने लगी थी। स्कूल, कोचिंग जाना सब संभालना होता था। सुबह स्कूल, दिन में कोचिंग और शाम के समय अभ्यास यही उस समय की दिनचर्या हुआ करती थी। और तब तक ये रंगमंच का भी एक हिस्सा बन चुकी थी, और अपनी कला का बखूबी प्रदर्शन कर रही थी। 

प्रतिभा का 12वीं के अच्छे परीक्षा परिणाम के बाद अब शहर के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग काॅलेज में प्रवेश हो गया। नृत्य का जुनून इतना था, कि पढ़ाई के साथ साथ मुम्बई में गंधर्व भी पढ़ने की ठान ली। 

प्रतिभा को अखिल भारतीय गंधर्व मंडल,मुंबई से अलंकार की उपाधि भी प्राप्त है। 

इनकी मंच प्रस्तुतियाँ अब तक उच्च स्तर पर पहुंच चुकी थी, और ख्याति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परचम फहरा रही थी।इन सब के दौरान ही इनकी इंजीनियरिंग की डिग्री भी पूरी हो चुकी थी। और इंजीनियर बनने का सपना भी पूरा हो चुका था, एक अच्छी नौकरी और साथ ही अपने कथक को कलेकर चलना था, वक्त के साथ इनकी नौकरी भी लग गई।

एक प्रतिष्ठित काॅलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर बन चुकी थी, और लगभग एक साल तक अपनी नौकरी को जारी रखा। 

और अब एम. टेक के लिए होने वाली परीक्षा में भी उत्तीर्ण हो चुकी थी।और मास्टर्स के लिए प्रवेश भी ले लिया था।

उस वक्त तक अच्छी नौकरी, कथक में एक उच्च स्तर, मास्टर्स की पढ़ाई भी चल रही थी। पर जीवन में क्या कमी है? यहीं बात अक्सर प्रतिभा सोचती रहती थी। 

कुछ समय बाद ही एक कथक कार्यक्रम में प्रतिभा का कोलकात्ता जाना हुआ। उसी यात्रा के दौरान प्रतिभा को एहसास हुआ, कि जिस तरह वो एक छोटे शहर आई है, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। 

वैसे ही अपने शहर के लिए कुछ किया जाना चाहिए। और शहर की बच्चियों के लिए कुछ ना कुछ जरुर किया जाना चाहिए। उस वक्त मौका था, कि प्रतिभा रंगमंच, थियेटर, और धारावाहिकों का हिस्सा बन सकती थी, या अपनी मास्टर्स की डिग्री पूरी कर कहीं बड़े शहर में नौकरी कर सकती थी। कोलकाता की यात्रा के दौरान ही प्रतिभा नें शहर और बच्चियों के लिए एक सपना सजा लिया और, प्रतिभा ने सोचा, कि अब शहर को कथक में कई बड़े चेहरे उपहार में देना है। 

इस एक कोलकाता की यात्रा ने तो इनकी जिंदगी के मायने ही बदल दिए और प्रतिभा नें अपनी नौकरी छोड़ने का मन बना लिया। जब यह बात इन्होंने अपने घर पर बताई, कि इन्होंने उज्जैन के बच्चों को कथक सीखानें और उन्हें आगे ले जाने का सोचा है। तब परिवार वालों ने कहा, कि तुम जो करों बस पूर्ण विश्वास, और कर्तव्यनिष्ठ होकर करना।

और प्रतिभा का अगला कदम सन् 2012 में अपनी *संस्था प्रतिभा संगीत कला संस्था* की ओर बढ़ चुका था। 

अब सपना आकार लेने लगा और अब प्रतिभा संगीत कला संस्था के बच्चे नेशनल, इंटरनेशनल प्रतियोगिताओं में अपना प्रदर्शन कर चुके हैं। और कई गोल्ड मेडल और अनेकों ईनाम प्राप्त कर चुके हैं। ओर विदेशों की धरती पर भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। कुछ बच्चों ने अब तक भारत का एकमात्र कथक इंस्टिट्यूट नेशनल कथक केन्द्र, दिल्ली में भी प्रवेश ले चुके हैं।

इसी दौरान इनकी शादी भी हो गई। 

ओर अब इनके जीवन का नया अध्याय शुरु हो चुका था।

जहाँ उनकी जिम्मेदारी बढ़ चुकी थी, अब वे एक बच्चे की माँ बन चुकी है। अब सवाल यही था, कि छोटा बच्चा, घर, परिवार, कथक , एक साथ कैसे संभाल पाती है? 

पर कहते हैं, ना कि जो बच्चा गर्भ में सुनता है, महसूस करता है, वैसे ही माहौल को वो अपना लेता है। ऐसा ही कुछ प्रतिभा के बेटे कबीर के साथ हुआ। उसे संगीत और नृत्य से अभी से लगाव है, और वह उस माहौल को पूरी तरह अपना चुका है। 

प्रतिभा अपने पति का भी आभार मानती है, जिन्होंने इनके सपनों को पूरा करने में पूरा सहयोग किया। इनके सपने को स्वयं का सपना समझा और एक पति के साथ-साथ एक पिता की जिम्मेदारी को भी बखूबी निभा रहे हैं। जब प्रतिभा मंच पर होती है, तब कबीर अपने पिता के साथ अपनी मम्मी के कथक नृत्य को देखता है। 

बच्चा बहुत छोटा होने के दौरान भी प्रतिभा अब भी अपनी संस्था को पूरा समय देती है, ताकि बच्चियों को बेहतर से बेहतर सीखाया जा सके। 

और जब – जब स्वयं की मंच पर प्रस्तुति देना होती है। तब प्रतिभा भी घंटों अभ्यास करती हैं। 

सपना, जो प्रतिभा ने देखा था, अब वो बहुत हद तक साकार होने लगा है। अब प्रतिभा चाहती है, कि वो एक गुरुकुल की स्थापना करें। जिसमें नृत्यांगनाओं का पूर्णतः समर्पण सिर्फ नृत्य की तरफ ही हो।

         उज्जैन के बच्चों के लिए इनका जो भाव है, वह एक बड़ी बहन की तरह है। आज सभी उन्हें गुरुदीदी बोलते हैं। इतनी आत्मीयता, प्रेम और कला का जो उपहार प्रतिभा शहर को दे रही है।

वहीं आज शहर को कई उभरते हुए चेहरे दे रहीं हैं। वह यहीं उनका कर्तव्य, और धर्म समझती है।

वो अक्सर कहती हैं, कि सोच अच्छी रखना चाहिए तथा पिछली गलतियों से सबक सीखते रहना चाहिए। सही कर्म करते चलिए, और भगवान का शुक्रिया करते रहिए, जीवन में सब कुछ सही होगा।

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