कराटे में ब्लैक बेल्ट, इंटरनेशनल रेफरी बनने के बाद, महिलाओं को आत्मरक्षा करना सीखाना है। – मोहन कनौजिया

अभी तक हमनें, हमारी टीम “अपनी पहचान” ने आपको कई क्षेत्रों के दिग्गजों से मिलवाया है उनके जीवन की कई घटनाओं से परिचय करवाया है। उस ही तरह आज हमारे बीच मोहन कनौजिया जी मौजूद हैं जिनका जीवन हमें प्रेरणा देता है। 

जिनके नाम अब तक नेशनल व इंटरनेशनल लेवल पर अनेकों बार गोल्ड मेडल, ब्लैक बेल्ट व अनेकों अवाॅर्ड साथ ही रेफरी बनने का मौका प्राप्त हो चुका है। 

तो आज हम अब आपके साथ मोहन कनौजिया जी के जीवन के कुछ अनछुए किस्से आपके साथ साझा करने जा रहे हैं। 

मोहन का जन्म मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में दिनांक 26 नवंबर सन् 1987 को एक अति साधारण परिवार में हुआ। जिसमें पिताजी का व्यापार रहा जो बहुत ही छोटे स्तर पर था। उसमें परिवार का गुज़ारा ही संभव था जो हो भी रहा था। 

जब मोहन घर के ही पास वाले अखाड़े में खेलने जाते तब उन्हें वहाँ  कराटे की प्रेक्टिस आकर्षित करती थी, तब मोहन  10 साल की उम्र में ही कराटे क्लास में जाने लगे।

पिताजी शहर के एक नामचीन पहलवानों में शामिल थे तो वही बात इनमें भी दिखाई देती थी। वक्त के पहले ही क्षेत्र में मोहन का नाम “कराटे” में विख्यात होने लगा था। फिर धीरे-धीरे शहर के साथ प्रदेश में मोहन कराटे को लेकर एक विश्वसनीय नाम व पहचान बनकर उभरे। 

“मोहन के जीवन में बस आकर्षण के लिए जाना, 

कब जीवन का लक्ष्य व पहचान बन जाएगी, कभी सोचा नहीं था।” 

मोहन ने कराटे शुरु किए, वहाँ प्रेक्टिस के साथ ही प्रतियोगिता में भाग भी लेने लगे थे, डिस्ट्रीक लेवल पर खेला उसके बाद सन् 1998 में स्टेट लेवल चैंपियनशिप में जाने का मौका मिला वहाँ जाकर कई अवार्ड्स प्राप्त किए। कराटों के साथ बीए तक पढ़ाई, भी की है। 

मोहन ने आजतक नेशनल व इंटरनेशनल लेवल पर अनेकों बार गोल्ड मेडल्स को जीता, व कई बार ब्लैक बेल्ट को अपने नाम किया। समय के साथ मोहन का नाम शहर ही नहीं देश में विख्यात होने लगा था। 

मोहन ने जितनी भी चैंपियनशिप को जीता है, उतनी ही बार इंटरनेशनल रेफरी किक बाॅक्सिंग, नेशनल कराटे रेफरी के रुप में भी अपनी योग्यता को सिद्ध किया है। 

महज़ 10 साल की उम्र में शुरु किए इस सफर से नाम, पहचान, गुरु के रूप में सम्मान व हार्दिक स्नेह सभी से प्राप्त हो रहा है। मोहन कहते हैं कि जब वो अपने से सीखे बच्चों को कराटे खेलते देखते हैं तब लगता है कि उनकी मेहनत व प्रयास सफल होने लगे हैं। 

मोहन ने एक वक्त पर आकर सोचा कि यदि मुझमें इतना टैलेंट है तो क्यों ना मैं दूसरे बच्चों व महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए तैयार करुं?? 

यही सोचकर मोहन ने सन् 2007 से बच्चों को ट्रेनिंग देने लगे, यकीनन नाम के साथ बच्चें व अन्य लोग भी जुड़ने लगे, मोहन का सपना भी पूरा होने लगा था। 

अब मोहन से कराटे के गुर सीखे बच्चे भी जब मेडल के साथ नज़र आते हैं तो उन बच्चों में अपने गुरू का अक्स भी शीशे की तरह पारदर्शी दिखाई देता है। यह बात भी सच है कि जिनकी संगत में बच्चें रहते हैं या जिनसे शिक्षा लेते हैं उनके गुण व तकनीक अपने आप दिखाई देने लग जाती है। 

बच्चों को ट्रेनिंग देने के साथ ही मोहन ने शहर के साथ-साथ देश के नामी इंस्टीट्यूट व स्कूलों, काॅलेजों में जाकर ट्रेनिंग, वर्कशॉप कैंप लगाते हैं। जिससे वहाँ के लोग कराटे व अन्य फिजीकल एक्टिविटी के लिए तैयार होने लगे हैं। 

मोहन का आज सरल उद्देश्य सिर्फ इतना है कि बच्चे मोबाइल, इंटरनेट की दुनिया से बाहर निकल कर जीवन का सफर देखे, खेलों व फिजीकल एक्टिविटी वाले खेलों को खेले व स्वयं के भविष्य को स्वस्थ बनाएं क्योंकि आज की मजबूती ही भविष्य की नींव होती है। 

मोहन अपने इंस्टीट्यूट या अन्य तरीकों से बच्चों व खासकर महिलाओं की सुरक्षा व सम्मान के लिए कैंप व क्लासेस आयोजित करते हैं जिससे महिलाओं पर कभी कोई कुदृष्टि ना रख पाएं।

मोहन बताते हैं कि  किसी भी रुप से इनका सफर आसान नहीं था कभी आर्थिक तंगी तो कभी कुछ लेकिन कभी हार – कभी जीत वाली स्थिति जब जीवन में शुरु हुई तब सब इतना कठिन नहीं लगा। 

मोहन बताते हैं लोग की गलत बोलते हैं कि हार नहीं मानना चाहिए, मेरा मानना है कि जिसने हार, थकान, नाकामी नहीं देखी, उसको कभी विजय, उच्च स्थिति या अपने आप का महत्व पता नहीं होगा। 

      इसलिए जीवन में यदि हार भी हो रही है तो उसको जीत का एक कदम मानकर आगे चलो, हार के बाद ही जीत आती है।

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